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शनिवार, 7 नवंबर 2026
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कंडी-ब्यास साहित्य उत्सव के तीसरे दिन उपन्यास विधा की ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परतों का हुआ गहन विश्लेषण

पंजाबी साहित्य अकादमी लुधियाना के सहयोग से दो उपन्यासों पर हुई विचार-चर्चाविभाजन की त्रासदी और कंडी क्षेत्र के जीवन-यथार्थ को मिली साहित्यिक अभिव्यक्तिमुकेरियां,(राजदार टाइम्स): कंडी-ब्यास साहित्य…

कंडी-ब्यास साहित्य उत्सव के तीसरे दिन उपन्यास विधा की ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परतों का हुआ गहन विश्लेषण
कंडी-ब्यास साहित्य उत्सव के तीसरे दिन उपन्यास विधा की ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परतों का हुआ गहन विश्लेषण

पंजाबी साहित्य अकादमी लुधियाना के सहयोग से दो उपन्यासों पर हुई विचार-चर्चा
विभाजन की त्रासदी और कंडी क्षेत्र के जीवन-यथार्थ को मिली साहित्यिक अभिव्यक्ति
मुकेरियां,(राजदार टाइम्स): कंडी-ब्यास साहित्य उत्सव के तीसरे एवं अंतिम दिन एस.पी.एन कॉलेज मुकेरियां में पंजाबी साहित्य अकादमी लुधियाना के सहयोग से विशेष पुस्तक चर्चा का आयोजन किया गया। कॉलेज की प्रबंधकीय समिति के सचिव संजीव आनंद ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की, जबकि पंजाबी साहित्य अकादमी लुधियाना के कार्यकारी सदस्य प्रिंसिपल नवतेज गढ़दीवाला विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए। अपने संबोधन में मुख्य अतिथि संजीव आनंद ने पंजाबी विभाग एवं पंजाबी साहित्य सभा मुकेरियां को इस तीन दिवसीय साहित्यिक उत्सव की सफलता के लिए बधाई दी। उन्होंने पंजाबी साहित्य अकादमी, लुधियाना का विशेष आभार व्यक्त करते हुए उपन्यासकार बलबीर परवाना और धर्मपाल साहिल का स्वागत किया। कॉलेज में भविष्य में भी ऐसे साहित्यिक एवं शोधपरक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे तथा शोध कार्यों को और बेहतर बनाने के प्रयास किए जाएंगे, ताकि विद्यार्थियों को पंजाबी भाषा एवं साहित्य के शोध से अधिक गहराई से जोड़ा जा सके। विशेष अतिथि प्रिंसिपल नवतेज गढ़दीवाला की उपस्थिति ने भी इस साहित्यिक आयोजन को विशेष महत्त्व प्रदान किया। उनकी सहभागिता पंजाबी साहित्य अकादमी एवं कॉलेज के बीच साहित्यिक सहयोग और आपसी साझेदारी का प्रतीक रही। इस दिन दो अलग-अलग सत्रों में प्रसिद्ध उपन्यासकार बलबीर परवाना के उपन्यास "'रौलियां वेले" तथा कंडी क्षेत्र के जीवन को अभिव्यक्त करने वाले धर्मपाल साहिल के उपन्यास "जलदूत"पर गंभीर एवं वैचारिक चर्चा की गई। पहले सत्र में ढाहां पुरस्कार विजेता उपन्यासकार बलबीर परवाना के उपन्यास 'रौलियां वेले' पर विचार-विमर्श किया गया। इस सत्र की अध्यक्षता गुरु नानक सिख स्टडीज विभाग पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ से डॉ.गुरपाल सिंह संधू ने की। एस.पी.एन कॉलेज के स्नातकोत्तर पंजाबी की विभागाध्यक्ष डॉ किरनजीत कौर एवं दशमेश गल्र्स कॉलेज के पंजाबी की विभागाध्यक्ष डॉ.सोनिया देवी ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। शोध-पत्रों एवं विचार-चर्चा के दौरान उपन्यास में पंजाब विभाजन की त्रासदी, विस्थापन, मानवीय पीड़ा एवं उसके सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों के मार्मिक चित्रण पर विस्तार से विचार किया गया। इस दौरान एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उभरकर सामने आया कि पंजाब विभाजन के सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिणामों के साथ-साथ उसके पीछे कार्यरत राजनीतिक कारणों का भी उपन्यासों में गहन विश्लेषण होना चाहिए। अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ.गुरपाल सिंह संधू ने कहा कि उपन्यास विधा का विस्तृत कैनवास लेखक को ऐतिहासिक घटनाओं की अनेक परतों को उजागर करने का अवसर प्रदान करता है। इसलिए विभाजन जैसी बड़ी ऐतिहासिक त्रासदी के राजनीतिक कारणों एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को और अधिक गहराई से समझने की आवश्यकता है।

उन्होंने बलबीर परवाना के उपन्यास में प्रस्तुत मानवीय पीड़ा के मार्मिक चित्रण की सराहना करते हुए इसे साहित्यिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रचना बताया। दूसरे सत्र में धर्मपाल साहिल के उपन्यास 'जलदूत' पर चर्चा हुई। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो.बलदेव सिंह बल्ली ने की। इसमें डॉ.सर्बजोत सिंह, अध्यक्ष पंजाबी साहित्य सभा, मुकेरियां ने अपना शोध-पत्र प्रस्तुत किया, जबकि दूसरा शोध-पत्र डॉ.अनुराग शर्मा, सेवानिवृत्त अध्यक्ष, डी.ए.वी कॉलेज जालंधर द्वारा प्रस्तुत किया गया। डॉ.सर्बजोत सिंह ने अपने शोध-पत्र में उपन्यास के पात्र किशन के संदर्भ में सामान्य एवं असामान्य मनुष्य के बीच के अंतर को विश्लेषण का केंद्र बनाया। उन्होंने कहा कि सामाजिक व्यवहार में अक्सर चालाकियों, जोड़-तोड़ और दुनियावी दांव-पेचों को समझदारी मान लिया जाता है, जबकि साधारण दिखाई देने वाले व्यक्ति के भीतर कई बार अधिक मानवीयता, सहजता एवं संवेदनशीलता विद्यमान होती है। उनके अनुसार, उपन्यास इसी सामाजिक मानसिकता पर प्रश्न खड़ा करता है कि वास्तविक समझदारी चालाकी में है या मानवीयता में। डॉ.अनुराग शर्मा ने अपने शोध-पत्र में किशन एवं राधा के पात्रों के आपसी संबंधों को भारतीय दार्शनिक परंपरा के शिव-शक्ति सिद्धांत से जोडक़र प्रस्तुत किया। उन्होंने उपन्यास में नारी-शक्ति, आध्यात्मिकता एवं मानवीय संबंधों की आंतरिक परतों का विश्लेषण करते हुए इसे भारतीय परंपरा के दार्शनिक संदर्भ में समझने का प्रयास किया। अध्यक्षीय भाषण देते हुए प्रो.बलदेव सिंह बल्ली ने कहा कि धर्मपाल साहिल ने पंजाबी उपन्यास साहित्य में कंडी क्षेत्र के जीवन-यथार्थ को सृजित करके इस क्षेत्र की एक विशिष्ट साहित्यिक पहचान स्थापित की है। कंडी की भौगोलिक स्थिति, लोकजीवन, संस्कृति एवं मानवीय संघर्षों को पंजाबी साहित्य के केंद्र में लाना उपन्यासकार की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। इस साहित्यिक आयोजन में हुए विचार-विमर्श ने यह स्पष्ट किया कि साहित्यिक उत्सव केवल पुस्तकों के लोकार्पण अथवा लेखकों के सम्मान तक सीमित नहीं होते, बल्कि ये समाज, ईतिहास, संस्कृति एवं मानवीय अस्तित्व से जुड़े गंभीर संवाद के सशक्त मंच भी होते हैं। अंत में कॉलेज के प्राचार्य डॉ.समीर शर्मा ने सभी अतिथियों, विद्वानों, लेखकों, शोधार्थियों एवं सहयोगियों का आभार व्यक्त किया। इस प्रकार तीन दिवसीय प्रथम कंडी-ब्यास साहित्य उत्सव साहित्यिक विचार-विमर्श, शोधपरक संवाद एवं कंडी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को उभारने के उद्देश्य के साथ शानदार ढंग से संपन्न हुआ। यह उत्सव अपने पीछे अविस्मरणीय यादों के साथ-साथ कंडी क्षेत्र के साहित्यिक अध्ययन एवं दस्तावेजीकरण की नई संभावनाएं भी छोड़ गया।

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