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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026
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विजयादशमी पर उदयपुर सिटी पैलेस के सलेहखाना में लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने किया शस्त्र पूजन

महाराणा सांगा और महाराणा प्रताप के दौर के खांडा, तलवार, कटार, ढाल और धनुष-बाण का वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूजन हुआ।

विजयादशमी पर उदयपुर सिटी पैलेस के सलेहखाना में लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने किया शस्त्र पूजन
प्रतीकात्मक तस्वीर: उदयपुर के ऐतिहासिक सिटी पैलेस का बाहरी भाग (फोटो: Hirumon, विकिमीडिया कॉमन्स, CC BY 3.0)

विजयादशमी के अवसर पर उदयपुर में मेवाड़ की सदियों पुरानी शस्त्र पूजन परंपरा पूरे विधि-विधान से निभाई गई। मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार के सदस्य और 77वें श्री एकलिंग दीवान डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने अपने पुत्र महाराज कुमार हरितराज सिंह मेवाड़ के साथ सिटी पैलेस स्थित ऐतिहासिक शस्त्रागार सलेहखाना में पूर्वजों के अस्त्र-शस्त्रों का पूजन किया।

पंडितों के वैदिक मंत्रोच्चार के बीच खांडा, तलवारें, भाले, कटार, ढाल, बंदूकें और अन्य पारंपरिक हथियारों की पूजा-अर्चना की गई। इस आयोजन के जरिए मेवाड़ की वीरता, युद्ध कौशल और पराक्रम को याद किया गया, जिसने इतिहास में अपनी अलग छाप छोड़ी है।

सलेहखाना में संरक्षित है अनमोल धरोहर

महाराणा उदयसिंह द्वितीय के शासनकाल में बने सिटी पैलेस का सलेहखाना मेवाड़ की सबसे महत्वपूर्ण धरोहरों में गिना जाता है। यहां महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप, महाराणा राज सिंह और मेवाड़ के अन्य शासकों से जुड़े ऐतिहासिक हथियारों का संग्रह सुरक्षित रखा गया है। विजयादशमी के दिन इन्हीं धरोहरों का पूजन कर परंपरा को आगे बढ़ाया जाता है।

मेवाड़ के ये अस्त्र-शस्त्र केवल युद्ध के साधन नहीं रहे, बल्कि उत्कृष्ट शिल्पकला के नमूने भी हैं। विशेष उत्सवों और राजकीय आयोजनों के लिए बनी तलवारों की मूठ पर सोने के बारीक तार, स्वर्ण वर्क, कुंदन, मीनाकारी और रत्नों की नक्काशी की जाती थी। ढालों पर स्वर्णकारी और भालों तथा कटारों पर उकेरी गई कलाकृतियां मेवाड़ के कारीगरों के हुनर को दर्शाती हैं।

शस्त्र पूजन में धनुष और लोहे के बाणों को भी विशेष रूप से शामिल किया गया। इतिहास बताता है कि महाराणा प्रताप के संघर्ष में मेवाड़ के आदिवासी योद्धाओं की बड़ी भूमिका रही और धनुष-बाण उनके प्रमुख युद्ध उपकरण थे। इस परंपरा के जरिए उस सामाजिक समरसता और साझा इतिहास को सम्मान दिया जाता है।

विजयादशमी पर शस्त्र पूजन की परंपरा देश के कई हिस्सों में निभाई जाती है, जिसे धर्म की अधर्म पर और अच्छाई की बुराई पर जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। उदयपुर का यह आयोजन मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत और पूर्वजों के शौर्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर भी बना।

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