
दातारपुर,(एसपी शर्मा शास्त्री): पराली जलाने से निकलने वाले धुएँ में सूक्ष्म कण नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और काला कार्बन जैसे विषैले तत्व होते हैं, जो सांस की बीमारियाँ, कैंसर एवं हृदय रोगों को बढ़ाते हैं। समाज सेवी देवेन्द्र बंसल ने बताया कि सन् 2020 के एक अध्ययन के अनुसार, यह दक्षिण एशिया में वायु प्रदूषण का प्रमुख स्रोत है, जिससे सर्दियों में दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक 500 से ऊपर पहुँच जाता है। पर्यावरण पर इसका गहरा असर पड़ता है काला कार्बन ग्लेशियरों के पिघलने की गति बढ़ाता है, ओजोन परत को नुकसान पहुँचता है और जैव विविधता घटती है। उन्होंने कहा कि मिट्टी के लिए तो यह अत्यंत हानिकारक है ऊष्मा से लाभकारी जीवाणु और फफूँद मर जाते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता घटती है और फसल उत्पादन 20-30 प्रतिशत तक कम हो सकता है। 2022 के एक अध्ययन में पाया गया कि पराली जलाने से नाइट्रोजन डाइऑक्साइड 22 से 80 प्रतिशत और कार्बन मोनोऑक्साइड 7 से 25 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। उन्होंने कहा यह प्रदूषण केवल स्थानीय क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता और दूर-दूर तक पहुँचता है, जहाँ सर्दियों की स्थिर हवा इसे फंसाए रखती है। इसका असर उत्तर प्रदेश, राजस्थान ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान और नेपाल तक भी जाता है। बंसल ने बताया कि 2020 में बीबीसी की एक रिपोर्ट में बताया गया कि यह धुंध पूरे उत्तर भारत को अपनी चपेट में ले लेती है। जिसके कारण विद्यालय बंद करने और स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने तक की स्थिति आ जाती है। सीमाओं से परे फैलने वाला यह प्रदूषण अब वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है। उन्होंने कहा कि किसानों के लिए पराली जलाना 'सबसे आसान और सस्ता' उपाय है, क्योंकि धान कटाई के बाद गेहूं बोने के लिए केवल 10 से 15 दिन का समय मिलता है। 2024 की एक रिपोर्ट में किसान ने कहा, "सरकार को समझना चाहिए कि हम भी इसी धुएं में सांस लेते हैं।" न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी) के कारण धान-गेहूं का चक्र तोडऩा कठिन है, क्योंकि विकल्पी फसलें लाभदायक नहीं हैं।



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