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गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026
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माकपा महासचिव एमए बेबी ने सुप्रीम कोर्ट को कहा 'सुप्रीम फेल्योर', अवमानना की चुनौती दी

प्रदर्शनों पर पाबंदियों के खिलाफ याचिका दायर करने वाले बेबी ने कहा कि उनका बयान अनुवाद कर जजों तक पहुंचाया जाए।

माकपा महासचिव एमए बेबी ने सुप्रीम कोर्ट को कहा 'सुप्रीम फेल्योर', अवमानना की चुनौती दी
माकपा महासचिव एमए बेबी और सुप्रीम कोर्ट

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव और पूर्व सांसद एमए बेबी ने सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली पर बेहद तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में शीर्ष अदालत जिस तरह अपनी जिम्मेदारियां निभा रही है, उससे लोग यह कहने को मजबूर हो सकते हैं कि आज का सुप्रीम कोर्ट 'सुप्रीम फेल्योर' है।

एक मलयालम समाचार चैनल से बातचीत में बेबी ने कहा कि उनकी इस टिप्पणी का अनुवाद करके सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों तक पहुंचाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अगर अदालत इस बयान पर स्वतः संज्ञान लेकर उन्हें अवमानना के लिए सजा देती है, तो वे इसे अपने राजनीतिक जीवन का अब तक का सबसे बड़ा सम्मान मानेंगे।

किस याचिका से जुड़ा है मामला

बेबी उन याचिकाओं के प्रमुख याचिकाकर्ता हैं, जिनमें विरोध-प्रदर्शनों पर लगाई गई पाबंदियों को चुनौती दी गई है। दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एसआईआर के मुद्दे पर प्रस्तावित प्रदर्शनों के दौरान मेट्रो, रेलवे और इंटरनेट सेवाओं पर लगी रोक के खिलाफ उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।

9 अक्तूबर को इस याचिका पर मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने तत्काल सुनवाई की थी। मामला उस दिन की सूची में शामिल नहीं था, लेकिन वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल के तत्काल उल्लेख के आग्रह पर अदालत ने इसे सुना था।

उस सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मेट्रो सेवाओं और नई दिल्ली तथा हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों पर ट्रेनों के आगमन पर पूरी तरह रोक को प्रशासनिक अधिकारों का अतिक्रमण बताया था। अदालत ने प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट बंद करने का आदेश हटाने, बैरिकेडिंग घटाकर यातायात सामान्य रखने और आम लोगों को परेशानी से बचाने के निर्देश दिए थे। कथित पुलिस ज्यादती की शिकायतों को देखते हुए सीसीटीवी फुटेज और डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने को भी कहा गया था।

इन निर्देशों के बावजूद बेबी का ताजा बयान बताता है कि विपक्ष का एक हिस्सा प्रदर्शनकारियों से जुड़े मामलों में न्यायिक रुख से संतुष्ट नहीं है। शीर्ष अदालत पर किसी राष्ट्रीय पार्टी के प्रमुख नेता की ऐसी खुली टिप्पणी ने सियासी और कानूनी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। अब नजर इस पर है कि अदालत या अन्य दल इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।

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