देशभर में विजयादशमी पर रावण के विशाल पुतलों का दहन होता है, लेकिन राजस्थान के कोटा में एक परंपरा इस पर्व को अलग पहचान देती है। यहां जेठी समाज के लोग रावण को आग से नहीं जलाते, बल्कि मिट्टी से बने रावण को पैरों से रौंदकर उसका अंत करते हैं। मंगलवार को नांता स्थित ऐतिहासिक लिम्बजा माता मंदिर के अखाड़े में यह परंपरा निभाई गई, जिसमें बच्चों से लेकर बुजुर्ग पहलवानों तक ने हिस्सा लिया।
रावण मर्दन के बाद अखाड़े में कुश्ती का दंगल भी हुआ। समाज के लोग अपने घरों से माता के लिए भोग लेकर पहुंचे और पूरे आयोजन में उत्सव का माहौल रहा।
कच्छ से कोटा आए थे जेठी पहलवान
जेठी समाज के मंदिर सेवक सोहन जेठी के अनुसार यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है। जेठी समाज मूल रूप से गुजरात के कच्छ क्षेत्र का पहलवान समुदाय है। मान्यता है कि जब कच्छ की राजकुमारी का विवाह कोटा राजघराने में हुआ, तब उनकी सुरक्षा और सेवा के लिए जेठी पहलवान भी साथ आए। उनकी कुश्ती कला से प्रभावित होकर तत्कालीन कोटा दरबार ने उन्हें यहीं बसा दिया और उनके लिए अखाड़े तथा कुलदेवी लिम्बजा माता के मंदिर स्थापित करवाए। तब से किशोरपुरा और नांता क्षेत्र में यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी निभाई जा रही है।
मिट्टी का रावण बनाने की प्रक्रिया श्राद्ध पक्ष की अमावस्या से शुरू हो जाती है। इसके लिए अखाड़े की मिट्टी में दूध, दही, शक्कर और शहद मिलाया जाता है, ताकि रावण को कुचलने के बाद होने वाले दंगल में पहलवानों को चोट का खतरा कम रहे। रावण को विशाल रूप देने के लिए उस पर गेहूं के बीज बोए जाते हैं, जो नवरात्र के नौ दिनों में अंकुरित होकर हरे हो जाते हैं।
सोहन जेठी बताते हैं कि रावण बनाने के दौरान मंदिर में आम श्रद्धालुओं का प्रवेश बंद रहता है और भक्त खिड़की से ही माता के दर्शन करते हैं। विजयादशमी पर कुलदेवी की विशेष पूजा के बाद समाज के लोग अखाड़े में पहुंचकर मिट्टी के रावण को पैरों से कुचलते हैं।
यह आयोजन केवल रावण मर्दन तक सीमित नहीं है, बल्कि जेठी समाज की ऐतिहासिक पहचान और पहलवानी की विरासत का उत्सव भी है। यह परंपरा नई पीढ़ी को अपने इतिहास, संस्कृति और अखाड़े के संस्कारों से जोड़े हुए है।



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