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बुधवार, 28 अक्टूबर 2026
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लेट टर्म डिलीवरी के कारण और 40 हफ्ते के बाद खतरे क्या हैं?

40 हफ्ते के बाद लेट टर्म डिलीवरी के कारण और जोखिम जानें, साथ ही सही समय पर डॉक्टर से संपर्क बनाए रखना जरूरी है।

लेट टर्म डिलीवरी के कारण और 40 हफ्ते के बाद खतरे क्या हैं?
लेट टर्म डिलीवरी के कारण और 40 हफ्ते के बाद खतरे क्या हैं?

गर्भावस्था के 40 हफ्ते पूरे होने के बाद प्रसव पीड़ा न शुरू होने पर कई महिलाओं को चिंता होती है। यह जरूरी है कि इस दौरान मां और बच्चे की सेहत पर ध्यान रखा जाए क्योंकि कभी-कभी डिलीवरी की सही तारीख का अनुमान नहीं लग पाता और प्रसव देर से शुरू होता है।

लेट टर्म और पोस्ट-टर्म प्रेग्नेंसी क्या है?

शारदा केयर, हेल्थसिटी हॉस्पिटल के गायनेकोलॉजी विभाग की डॉ. लिपी शर्मा बताती हैं कि 41 हफ्ते से 42 हफ्ते से पहले की गर्भावस्था को लेट टर्म कहा जाता है, जबकि 42 हफ्ते या उससे अधिक की गर्भावस्था को पोस्ट-टर्म कहा जाता है।

लेट टर्म डिलीवरी के खतरे

गर्भावस्था का समय बढ़ने के साथ प्लेसेंटा की कार्यक्षमता कम हो सकती है और गर्भ में पानी की मात्रा घट सकती है, जिससे बच्चे की सेहत पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, बच्चे का वजन अधिक होने पर सामान्य प्रसव में दिक्कतें आ सकती हैं। ऐसे मामलों में डॉक्टर बच्चे की धड़कन, हलचल और गर्भ में पानी की मात्रा की जांच करते हैं। जरूरत पड़ने पर लेबर इंडक्शन यानी चिकित्सकीय तरीके से प्रसव शुरू कराने की सलाह दी जाती है। आमतौर पर 41 हफ्ते के आसपास इस विकल्प पर विचार किया जाता है।

डॉक्टर से संपर्क बनाए रखें

ड्यू डेट निकलने के बाद खुद से इंतजार न करें और नियमित रूप से अपने डॉक्टर से संपर्क में रहें। यदि बच्चे की हलचल कम हो जाए, पानी निकलने लगे या रक्तस्राव हो, तो तुरंत अस्पताल जाएं। सही समय पर जांच और उचित चिकित्सकीय देखभाल से मां और बच्चे दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।

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